
बेंगलुरु ; कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच जारी विवाद के बीच मेकेदातु परियोजना को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। सेंट्रल वॉटर कमीशन (CWC) ने कर्नाटक सरकार की ओर से जमा की गई डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) वापस लौटा दी है। आयोग का कहना है कि मौजूदा प्रस्ताव कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के फैसले और वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप नहीं है।
CWC ने 29 जून को कर्नाटक सरकार को DPR लौटाते हुए इसमें आवश्यक बदलाव करने के सुझाव दिए हैं। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब मेकेदातु परियोजना को लेकर दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। तमिलनाडु लगातार इस परियोजना का विरोध करता रहा है, जबकि कर्नाटक इसे अपनी पेयजल और जल प्रबंधन जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण बताता है।
जानकारी के अनुसार, कर्नाटक सरकार ने संशोधित DPR में पानी के भंडारण और उपयोग क्षमता से जुड़े कुछ बदलाव प्रस्तावित किए थे। राज्य सरकार ने उपयोग के लिए जमा किए जा सकने वाले पानी की मात्रा को बढ़ाकर 2.2 टीएमसीएफटी करने का प्रस्ताव रखा था। इसी संशोधन के बाद CWC ने परियोजना रिपोर्ट की समीक्षा की और इसे मौजूदा रूप में स्वीकार करने के बजाय वापस भेजने का फैसला किया।
कावेरी जल विवाद लंबे समय से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच तनाव का कारण रहा है। दोनों राज्यों की निर्भरता कावेरी नदी के पानी पर है और इसी वजह से नदी से जुड़े किसी भी बड़े प्रोजेक्ट पर दोनों पक्षों की नजर रहती है।
मेकेदातु परियोजना कर्नाटक के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना है। राज्य सरकार का कहना है कि इस परियोजना के जरिए बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों में पेयजल की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा जल संरक्षण और बिजली उत्पादन की दिशा में भी यह परियोजना महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
वहीं, तमिलनाडु सरकार इस परियोजना का लगातार विरोध करती रही है। उसका तर्क है कि मेकेदातु बांध बनने से कावेरी के पानी के प्रवाह पर असर पड़ सकता है और राज्य के किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। तमिलनाडु का कहना है कि परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले कावेरी जल बंटवारे से जुड़े मौजूदा समझौतों और न्यायिक आदेशों का पालन जरूरी है।
संशोधित DPR में कर्नाटक सरकार ने एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया था। इसमें ‘शिवनसमुद्र रन-ऑफ-द-रिवर पावर प्रोजेक्ट’ नाम का नया हिस्सा शामिल किया गया था। इस प्रस्ताव के तहत कावेरी नदी पर एक डायवर्जन वियर बनाने की योजना थी, जिससे पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने और जल विद्युत उत्पादन से जुड़ी संभावनाओं को बढ़ाने का उद्देश्य था।
हालांकि, CWC ने इस संशोधन को भी मौजूदा नियमों और न्यायिक फैसलों के संदर्भ में देखा है। आयोग का मानना है कि परियोजना प्रस्ताव में ऐसे बदलाव किए जाने चाहिए, जो कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप हों।
कर्नाटक सरकार अब CWC के सुझावों के आधार पर DPR में बदलाव कर सकती है। इसके बाद संशोधित रिपोर्ट को दोबारा मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में तमिलनाडु की आपत्तियां और कानूनी पहलू भी अहम भूमिका निभाएंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि मेकेदातु परियोजना केवल एक बांध निर्माण योजना नहीं है, बल्कि यह अंतरराज्यीय जल प्रबंधन से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है। ऐसे मामलों में तकनीकी पहलुओं के साथ-साथ राज्यों के अधिकार, पर्यावरणीय प्रभाव और न्यायिक निर्देशों का संतुलन बनाना जरूरी होता है।
फिलहाल CWC के फैसले के बाद परियोजना की मंजूरी प्रक्रिया में एक और चरण जुड़ गया है। कर्नाटक को अब आयोग के सुझावों के अनुसार बदलाव करने होंगे, जबकि तमिलनाडु इस घटनाक्रम को अपने पक्ष में देख रहा है।
मेकेदातु परियोजना पर आगे की दिशा अब संशोधित DPR, केंद्र सरकार की समीक्षा और दोनों राज्यों के बीच बातचीत पर निर्भर करेगी। कावेरी जल विवाद के लंबे इतिहास को देखते हुए इस मामले में आने वाले दिनों में राजनीतिक और कानूनी गतिविधियां तेज होने की संभावना है।





